मंडी और सिरमौर के पंझोता आंदोलन के आंदोलनकारियों के बलिदान को भी जरूर करें याद

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सिरमौर न्यूज़

इस वर्ष स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के सिलसिले में देशभर में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। 15 अगस्त 1947 को हमें ब्रिटिश शासन के 200 सालों के राज से आजादी मिली थी. ये दिन हमारे फ़्रीडम फाइटर्स के त्याग, तपस्या और बलिदान की याद दिलाता है. असंख्य वीरों ने देश के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया था और आजाद भारत के सपने को साकार किया था. ये इन असाधारण वीरों का बलिदान ही है कि हम आज आजाद भारत में सांस ले पा रहे हैं.


भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन में देश भर के लोगों ने योगदान दिया। दूरदराज पहाड़ी राज्यों के भी असंख्य लोगों ने भी स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया था। हिमाचल के मंडी और सिरमौर के राजगढ़ में स्थानीय राजाओं के खिलाफ आंदोलन किए। यह आंदोलन अप्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन थे। स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर मंडी और सिरमौर के पंझोता आंदोलन के आंदोलनकारियों के बलिदान को भी जरूर याद करना चाहिए।


हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों के लोग अंग्रेजों की गुलामी और राजशाही के दबावों से पीड़ित थे। छोटे पहाड़ी राज्यों के राजा अंग्रेजों द्वारा तय की गई व्यवस्था के अनुसार शासन कर रहे थे शासन की दोहरी प्रणाली से परेशान क्षेत्र के लोग लोगों के बीच भी आजादी की लड़ाई की चिंगारी पहुंची विशेषकर हिमाचल के मंडी और सिरमौर के लोगों में शासन प्रणाली के खिलाफ विद्रोह भड़का सिरमौर के राजगढ़ क्षेत्र का पचौता आंदोलन हथियारों के जोर पर शुरू हुआ जबकि मंडी में गुलामी की मानसिकता वाले शासन के प्रति बड़ी संख्या में लोग लामबंद हुए और विद्रोह की बड़ी योजना बनाई गई। प्रजामंडल ने सीधे तौर पर साम्राज्य के अधीन आने वाले क्षेत्रों में ब्रिटिश दमन के विरुद्ध विरोध किया और लड़ाई का एलान कर दिया। इस दौरान हिमाचल की अन्य रियासतों में सामाजिक और राजनितिक सुधारों के लिए आन्दोलन हुए। इन आंदोलनों का प्रत्यक्ष उद्देश्य गुलामी की बेड़ियों से आजादी ही था। सुधारों के प्रति आंदोलन की सुगबुगाहट लगभग हर क्षेत्र में शुरू हो गई थी। हालाँकि यह आन्दोलन सीधे तौर पर अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं बल्कि राजाओं के विरुद्ध थे और इसलिए इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम का एक हिस्सा नही कहा गया।