बेनियत होती जा रही निजी स्कूल संचालको की नियत

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सिरमौर न्यूज़ – पांवटा साहिब

फीस के नाम पर अभिभावकों की कमर तोड़ चुके निजी स्कूल संचालकों का पेसो से पेट नहीं भर रहा है। निजी स्कूलो में प्रतिवर्ष बढाए जाने वाली फीस को लेकर आम अभिभावक की कमर तोड कर रखदी है इसके साथ स्कूल की अन्य गतिविधियों के लिए भी पैसा बसूल किया जाता है। जब निजी स्कूल संचालकों का इतनी कमाई से भी मन नहीं भरा तो लेखन व् पठान सामग्री को लेकर कमाई के कई धन्धे निजी स्कूल संचालको ने निकाल लिए है। निजी स्कूल संचालकों की मनमानी के चलते अब स्कूल फीस बिल लाने जा रही है।

निजी स्कूलों की मनमानी केवल अभिभावकों की जेब ढीली करने तक सीमित नहीं बल्कि कई निजी स्कूल अध्यापक-अध्यापिकाओ को जो वेतन देते असल में वो उसका आधा पैसा ही अध्यापक-अध्यापिकाओ को नसीब हो पाता है। नाम न छापने की शर्त पर एक सूत्र ने बताया की उनके स्कूल में चेक के द्वारा सेलरी दी जाती है लेकिन उसके बाद आधा पैसा उनसे स्कूल नगद वापिस ले लेता है ताकि मोटी कमाई की जा सके और खर्चा दिखाया जा सके। इससे भी चौकाने वाली बात यह है कि उन्ही बच्चो की फीस से कमाए गये धन से स्कूल के लिये जमीन आए दिन खरीद ली जाती है और खर्चा स्कूल मे दिखा जाता है अव्वल तो वह जमीन स्कूल या ट्रस्ट या सोसाइटी के नाम ही होने की सम्भावना है किन्तु कही ना कही निजी संचालक खाक पति से करोड पति बन गए है। और ऐसे में सरकार द्धारा नियंत्रण लगाना एक आम आदमी के लिये भलाई का काम किया जा रहा है।

स्कूल यूनिफार्म के लिये भी एक दर्जी सुनिश्चित कर दिया गया है , अभिभावक अपनी मर्जी से कही से भी सस्ती यूनिफार्म नही सिलवा सकता , जिसका कमीशन स्कूल प्रबंधन ले लेता है ,शूज के लिये भी दुकाने फिक्स कर दी गयी है ताकि किसी अन्य दुकान से अभिभावक सस्ता जूता ना खरीद सके। कुल मिला कर स्कूल प्रबंधन अभिभावकों के खून पसीने की कमाई को चूसने के हर हथकंडे अपना रहे है। कई बार टीसी तक के लिए बच्चो व् अभिभावकों की मानसिक तौर पर प्रताढित किया जाता है। बताया जा रहा है की कुछ निजी स्कूल ऑनलाइन स्टडी के नाम पर अभिभावकों से आधी फीस बसूलते रहे जबकि अध्यापकों को उनका मेहनताना नहीं दिया गया जो बच्चो को शिक्षित करने में कमी नहीं छोड़ रहे है। कुल मिलकर निजी स्कूल संचालको की नियत बेनियत होती जा रही है और अब इस डर से सरकार के स्कूल फीस बिल का विरोध कर रहे है ताकि शिक्षा के नाम पर चल रही उनकी दुकाने बंद न हो जाएँ।