लॉकडाउन के दौरान गांव में जंगली सब्जियों का आन्नद उठा रहे स्थानीय लोग

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पवन तोमर – राजगढ़

कोरोना वायरस को लेकर प्रदेश में लगे लॉकडाउन के चलते लोग जहां घरों में दुबके बैठे हैं । वहीं पर इन दिनों लोगों के खानपान को लेकर काफी बदलाव देखने को मिल रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों में बाजारों से सब्जियों की सप्लाई काफी दिनों से बंद है और लोग अब जंगलों में उत्पन्न होने वाली विषैले तत्व से रहित और जैविक व स्वादिष्ट साग-सब्जियों का खाने में बड़ी रूचि दिखा रहे हैं । राजगढ़ क्षेत्र में इन दिनों कचनार, जिसे लोग करयाल भी कहते हैं, के पेड़ कलियों और फूलों से लदे है और लोगों द्वारा इसका उपयोग सब्जी व रायता बनाने के लिए किया जा रहा है । कई लोगों द्वारा कचनार की कलियों का आचार भी बनाया जा रहा है । आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, डॉ0 विवेक कंवर के अनुसार कचनार की सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर है और कचनार की छाल का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं के बनाने में भी किया जाता है । इनका कहना है कि कचनार की छाल का शरीर के किसी भाग की गांठ को गलाने में सबसे उत्तम औषधी है । इसके अतिरिक्त रक्त विकार, त्वचा रोग जैसे खाज-खुजली, एक्जीमा, फोड़े-फंूसी के उपचार में इसकी छाल उपयोग में लाई जाती है ।
पीरन गांव के अतर सिंह ठाकुर का कहना है कि इन दिनों गांव में जंगली शुद्ध सब्जियों की बहार आई है जिनमें कचनार, काथी की कोपलें, रामबाण के गोव्वा, फेगड़े, खड़की के कोमल पत्ते, खडडों में उगने वाली छूछ इत्यादि जंगली सब्जियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है । इनका कहना है कि बाजार से मिलने वाली सब्जियां के संक्रमित होने की संभावना के चलते लोग कम खरीद रहे हैं । इनका कहना है कि युवा पीढ़ी को जंगली सब्जियां ज्यादा पसंद नहीं परंतु लॉकडाउन के दौरान बच्चों को अपने पहाड़ी व्यंजनों को खाने का मौका मिल रहा है और अपनी संस्कृति की पहचान होने लगी है अन्यथा अधिकांश युवा शहरों में पढ़ाई अथवा नौकरी पर रहते हैं ।