सिरमौर के प्रसिद्ध लोक गायक और अनुवादक मंगल सिंह तोमर पंचतत्वों में विलीन

Local News शिलाई स्वास्थ्य हिमाचल

सिरमौर न्यूज़ – शिलाई

जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र के मशहूर लेखक, लोक गायक और अनुवादक मंगल सिंह तोमर पंचतत्वों में विलीन हो गए है। मंगलवार को उनके पैतृक गांव शावड़ी मे उनका अंतिम संस्कार किया गया। 75 वर्षीय मंगल सिंह तोमर की सोमवार देर रात हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई थी। उनके निधन से लोक गायकों सहित गिरिपार क्षेत्र में शोक है। दुःख की ऐसी घड़ी में गिरिपार क्षेत्र के लोगो ने उनकी आत्मा की शांति के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। मशहूर लेखक, लोक गायक और अनुवादक मंगल सिंह तोमर अपनी सांसारिक यात्रा पूरी जरूर कर गए है लेकिन अपने पीछे अमूल्य निधि व धरोहर छोड़ गए है उसे आने वाली कई पीढ़िया याद करेगी

कुछ ऐसा रहा मंगल सिंह तोमर के जीवन का सफर

हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के अंतर्गत गिरिपार क्षेत्र के ग्राम शावड़ी पोस्ट शागवा में शड़वाल खानदान के स्व. शिविया राम की धर्मपत्नी बारो देवी की कोख से लेखक व प्रसिद्ध लोक गायक मंगल सिंह तोमर का जन्म में हुआ। अम्बोया विद्यालय से अपनी दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मंगल सिंह घरेलु कार्यों में व्यस्त रहे। जिसके बाद सन् 1970 में ग्राम पंचायत दुगाना के सरपंच व सन् 1985-86 में शागवा पंचायत के उप प्रधान निर्विरोध चुने गये। बचपन से ही गीत संगीत में रुचि रखने वाले मंगल सिंह तोमर गीत सुनने के साथ-साथ स्वयं भी गीत गाने व लिखने का शौक रखते थे। सुनी सुनाई हारुलें, सिरमौर लोक गीतों के अलावा गीह, ॐ गुरु देवाए नमः, म्हारा सिरमौर बड़ा प्यारा तथा रूपी और संतराम के गीतों को अपनी कल्पनानुसार बनाए व लिखे हैं।

श्री श्री 1008 गुरु पूर्णानन्द जी महाराज का रहा आशीर्वाद

मंगल सिंह तोमर न केवल मशहूर लेखक, लोक गायक और अनुवादक थे बल्कि सनातन धर्म में सच्ची आस्था रखने वाले मंगल सिंह तोमर श्री श्री 1008 गुरु पूर्णानन्द जी महाराज के साधक भी थे। गुरु के आशीर्वाद ने इन्हें इस श्रमसाध्य कार्य से कभी विचलित नहीं होने दिया। यही कारण है कि पिछले 45 वर्षों का अथक परिश्रम आज एक पुस्तक हारूल के रूप में एक अमूल्य निधि व धरोहर के स्वरूप क्षेत्र की पीढ़ी को समर्पित कर गये। इस किताब मे उन्होंने पहाड़ी मे लिखने के साथ साथ हिंदी मे भी अनुवाद किया ताकि देश विदेश के लोग भी गिरिपार क्षेत्र की संस्कृति को जान सके। उनके इस सपने को किताब का रूप देने मे समाजसेवी आरपी तिवारी का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने भाषा एवं संस्कृति विभाग के कईं लेखों का हिंदी रूपांतरण मे अपना अहम योगदान दिया।