कथा सुनने मात्र से चरित्र शुद्धि नहीं हो सकती ,कथा को हृदय में उतारना आवश्यक

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सिरमौर न्यूज़ – राजगढ़

” जब तक चरित्र शुद्धि नहीं होगी तब तक जीवन में वास्तविक अध्यात्म का अभ्युदय नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति को अध्यात्म मार्ग पर चलना चाहिए। हमें दूसरों की अपेक्षा अपने चरित्र में झांक कर देखना चाहिए, यदि हमारे चरित्र में कहीं कोई अशुद्धि हो तो सैकड़ों कथा सुनने व मंदिर जाने या हजारों लीटर दूध भगवान शिव को अर्पित करने पर भी मन की शांति नहीं मिल सकती।” यह बात कथा वक्ता विजय भारद्वाज ने प्राचीन शिव मंदिर करगाणु (सनौरा) में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर चल रहे श्री शिव महापुराण कथा के दौरान कही। उन्होंने भगवान शंकर के मंगलमय अवतारों की कथाएं सुनाते कहा की चरित्र की शुद्धि ही श्रेष्ठ शुद्धि है।


कथा सुनने मात्र से चरित्र शुद्धि नहीं हो सकती कथा को हृदय में उतारना आवश्यक है तभी कथा प्रभावशाली होगी। पूजा करने से चरित्र शुद्धि नहीं होती हम भगवान की पूजा करते हैं, सिंदूर अक्षत धूप दीप नैवेद्य अर्पित करते हैं। परंतु रावण तो अपना सिर ही काट कर भगवान को समर्पित कर दिया करता था। हम तो दो-चार रटी रटाई स्तुतियां भगवान के सामने गा लेते हैं परंतु रावण जब भी भगवान का दर्शन करता नई स्तुति का प्राकट्य कर देता और स्तुति भी ऐसी भगवान शंकर भी नृत्य करने पर विवश हो जाते हैं यदि हम श्री राम और रावण में तुलना करें तो हर स्थान पर रावण राम से बड़ा दिखाई देता है। रावण ब्राह्मण है श्रीराम क्षत्रिय यहां भी राम से बड़ा राज्य की बात करें तो राज्य भी रामजी से बड़ा है रावण का प्रजा कि यदि बात करें तो रावण की प्रजा राजा के एक निर्णय की प्रतीक्षा करती है वह सही हो या गलत एक निर्णय पर पूरी प्रजा मरने और मारने को तैयार है। परंतु श्रीराम की प्रजा ऐसे जिन्होंने अपने राजा को ही राज्य से बाहर निकाल दिया। लेकिन रावण को महान नहीं माना जाता है। आज तक किसी ने भी अपनी संतान का नाम रावण नहीं रखा पर हर चौथे का नाम राम जरूर रखा क्यों क्योंकि रावण में एक कमी है, जिस कमी के कारण आज भी रावण दरवाजे के बाहर खड़ा रहता है वह कमी है चरित्र शुद्धि जो रावण है वह चरित्रहीन है और श्री राम चरित्रवान है। इसलिए चरित्र शुद्धि श्रेष्ठ शुद्धि है जिनका चरित्र शुद्ध है वही भगवान शंकर अवतार ग्रहण करते हैं शीलाद के यहां भगवान नंदी रूप में प्रकट हुए के घर में भगवान विश्वानर के घर भगवान गृहपति बन कर के आए अत्रि अनुसूया के यहां दुर्वासा बन कर के आए गौतम पुत्री अंजलि के घर हनुमान बन कर के आए और समस्त जीव जगत का कल्याण किया।