सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में शुरू हुआ बूढ़ी दीवाली का पर्व

मनोरंजन हिमाचल

सिरमौर न्यूज़ / शिलाई

जिला सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र आगामी सात दिनों तक नाच गाने और दावतों में व्यस्त रहेगा । समूचे देश में दीपावली कार्तिक माह की अमावस्या को मनाई जाती है लेकिन जिला सिरमौर के ट्रांसगिरी क्षेत्र व उत्तरांचल प्रदेश के बावर-जौनसार क्षेत्र में दीवाली के ठीक एक महीने बाद फिर से दीवली मनाई जाती है। इस अनोखे त्योहार को बूढ़ी दिवाली कहा जाता है। इस संबंध में दो मान्यताएं विशेष तौर पर प्रचलित है। कुछ लोगों का मानना है कि दिवाली के समय में महाभारत कालीन युद्ध चल रहा था इस युद्ध की समाप्ति के बाद कबायली क्षेत्र में फिर से दिवाली मनाई गई। जबकि एक मान्यता यह भी है कि दैत्य राज बली के दोबारा धरती पर आगमन की खुशी से इस क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली की परंपरा शुरू हुई। सात दिनों तक चलने वाला बूढ़ी दीवाली का पर्व बुरी आत्माओं को गांवों से बाहर खदेड़ के मशाल यात्रा के साथ ही शुरू हो गई है। मान्यता है कि गिरिपार क्षेत्र में सतयुग से लेकर बूढ़ी दिवाली की रिवायत चली आ रही है। बूढ़ी दीवाली पर्व की खास बात यह है कि देश भर में अनोखा त्यौहार आज भी प्राचीन तरीक़े से ही मनाया जाता है। और पाश्चात्य संस्कृति के इस दौर में भी क्षेत्र के लोगों ने इस कबायली परम्परा को संजोह कर रखा है। बूढ़ी दीवाली देश भर में प्रचीन संस्कृति के संरक्षण का जीवंत उदहारण है। इस पर्व की शुरुआत रात को गांव के सांझे प्रांगण में अलाव जलाकर और सुबह के समय मशाल यात्रा निकालकर होती है। मशाल यात्रा के दौरान प्राचीन वाद्य यंत्रों की धुनों में नाचते गाते मदमस्त लोग देव स्तुतियों के साथ बुरी आत्माओं को भला बुरा कह कर गांव से बाहर खदेड़ देते हैं और बुराइयों को खदेड़ने की खुशी में बलाराज जलाते हैं।

क्षेत्र के सैकड़ों गांव में बूढ़ी दिवाली कब से और क्यों मनाई जाती है इसके स्पष्ट प्रमाण तो नहीं है लेकिन मान्यता है कि जब दैत्यराज बली धरती वामन भगवान को दान करने के बाद पाताल से एक बार धरती पर आए थे। उनके आगमन की खुशी में हाटी क्षेत्र में इस त्यौहार की शुरुआत हुई।