फलीभूत हो रहा ” फूट डालो -राज करो ” का बीज

लेख

आजादी के 72 वे स्वतंत्रता दिवस समारोह पर एक प्रश्न मन में कोंदने लगा । जिसके जवाब की अपेक्षा आप सभी से अपेक्षित है। जरा सोचिये क्या हम सच में स्वतंत्र है ? क्या हम सच में किसी के पराधीन नहीं है ?

“पराधीनता “ फिर चाहे वो अंग्रेज़ों की रही हो अथवा उनके द्वारा पढ़ाये गए भारतीय शिष्यों की रही हो। कुछ भी कहो अंग्रेज़ लोग तो चले गए , जिसकी ख़ुशी में हम स्वतंत्रता दिवस मनाते है। परन्तु उनके द्वारा ” फूट डालो -राज करो “ का बीज लगता है भली भांति फलीभूत हो रहा है। और जिसका पोषण करने में हमारे कुछ अपने ही भारतीय लोग उस परंपरा को चला कर अंग्रेज़ो की विचारधारा को ज़िंदा रखे हुए है । तो  फिर कैसे आजादी?

खैर, देश और प्रदेश स्तर पर इस पर चर्चा अथवा इसके परिणाम का असर आप सभी देख ही रहे है। परन्तु एक आम आदमी को पराधीनता का अर्थ सरल शब्दों में समझाने के लिए हम छोटे स्तर पर एक चर्चा कर लेते है ” फूट डालो -राज करो “ नीति पर चलने वाले उन अनुयायियों की। वो फिर चाहे पड़ोस हो ,परिवार हो ,गांव हो जिला हो या फिर हमारा राज्य। निम्न स्तर पर तो हम सभी इस नीति का भुक्तान करते ही रहते है परन्तु समाज एक ऐसा अंग है जिससे ऐसी विचारधारा के लोगो ने आपस में समुदायों को बाँट कर दो फाड़ तो छोड़ो, चार फाड़ भी किये हुए है। अंग्रेज़ो के ये वंशज इस तरह से ” फूट डालो -राज करो “ की नीति को अपनाकर पूरे क्षेत्र में आपसी फूट का जहर पैदा कर रहे है कि जिससे देश तो दूर अपने ही क्षेत्र अथवा शहर का माहौल बिगड़ रहा है । किसी विभाग अथवा दल की बात को छोड़ कर हम पत्रकारिता के क्षेत्र पर बात करें तो सच्चाई को अगर सामने लाया जाता है तो पत्रकारों का दूसरा पक्ष उस भ्रष्टाचारियों को पहना देने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है फिर चाहे राजनैतिक दबाव ही क्यों न हो । यहीं से जन्म होता है गुटबंदी का । और इसे काम करवाने वाले मुखिया चाहे वो पत्रकारिता से सम्बंधित हों अथवा अन्य किसी भी क्षेत्र से , तो वहां पर भ्रष्टाचार अथवा ” फूट डालो -राज करो “ नीति स्वतः ही सफल करवा जाते है । तो मरी नज़र में वो ज्यादा दोषी है । भले ही धनी गुट के अधिपति बन कर वह चापलूस दरवारियों से अपनी जय जयकार करवाता रहे । हंसी तो अपने उन सिरमौरी भाइयों पर आती है जो अपने ही समुदाय के लोगों के साथ न जुड़ कर तथाकथित अंग्रेजों के वंशज की अधीनता चाटुकारिता को बल प्रदान करते है । मूरख ये भूल जाते है कि उनकी अपनी ही छवि इतनी प्रतिभाशाली है कि ये बाहरी तत्व उन्हें अपनी ढाल बना कर उनका  जमकर इस्तेमाल कर रहे है और वो कठपूतली बन कर अपने लोगो से बुरे बन रहे है । निसंदेह हम भारतीय है पूरा भारत हमारा अपना है और सभी राज्यों के लोग भी हमारे अपने है, सभी को अधिकार है किसी भी राज्य में जाकर अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर सकें । बशर्ते समुदाय में फूट का कारन न बने , यदि कोई ऐसा करता है तो हमारे लिए चिंता का विषय है और इसके लिए सतर्क होना जरुरी है । क्योंकि स्वच्छ विचारधारा के समुदाय अथवा समाज से ही एक सदृढ़ राष्ट्र की परिजल्पना की जा सकती है तभी सही मायने में हम आजादी को मना पाएंगे ।

– दिगम्बर सिंह ‘शाश्वत’ सिरमौरी